आगरा: शुक्रवार 12 दिसंबर 2025
किसी जमाने में, ताजमहल की चांदनी में भीगी हुई आगरा की गलियों का एक अपना ही जादू था, जहाँ घोड़ों की टापों की लय शहर की आत्मा की तरह धड़कती रहती थी। रंग-बिरंगे तांगे, फूलों से सजी छतरियाँ, घंटियों और घुंघरुओं से सजे घोड़े, और पगड़ी बांधे मुस्कुराते तांगेवाले, यह सब कुछ आगरा की रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा था। विदेशी सैलानी तांगे पर बैठकर खुद को किसी मुगलकालीन दृश्य का हिस्सा समझते, और स्थानीय लोग इसे अपनी सुलभ, आरामदायक और भरोसेमंद सवारी मानते थे।
ताजगंज से बेलनगंज तक तांगों की टन-टन शहर में एक खुशगवार धुन बिखेरती थी। अब आगरा की पहचान है सिर्फ धुआं, धूल, धक्के!एक ऐसा समय था जब आगरा में हज़ारों तांगे दौड़ते थे। शेयर तांगे में पूरा परिवार बैठकर सस्ते में सफर करता, छात्र स्कूल जाते, दुकानदार रोज़मर्रा के कामों के लिए इन्हीं पर निर्भर रहते, और सैलानी ताजमहल तक की यात्रा को रोमांटिक यादों में बदल लेते।

तांगा सिर्फ़ एक वाहन नहीं था, यह आगरा की सामाजिक ऊर्जा, संस्कृति और जीवनशैली का जीवंत प्रतीक था।इस सांस्कृतिक विरासत का असर बॉलीवुड तक पहुँचा। ‘शोले’ की मशहूर बसंती और उसकी धन्नो ने तांगे को एक नया सिनेमाई चरित्र दे दिया। ‘तीसरी कसम’ में राज कपूर का तांगा चलाता रूप आज भी दर्शकों की आंखें नम कर देता है। बलराज साहनी गरम हवा में! कई फिल्मों में तांगा रोमांस, साहस और सादगी का पर्याय बना।

आगरा की तांगा संस्कृति भी ऐसी ही थी, बिना शोर, बिना धुएँ, बिना जल्दबाज़ी, एक शांत, खूबसूरत अनुभव। लेकिन आज तस्वीर बिल्कुल बदल चुकी है। आगरा नगर निगम द्वारा ट्रैफिक प्रबंधन के नाम पर लगाए गए कई प्रतिबंधों और आधुनिक मोटर वाहनों के बढ़ते दबदबे ने तांगा संस्कृति को लगभग खत्म कर दिया है। शहर के बड़े इलाकों से तांगे गायब हो चुके हैं, और अब वे सिर्फ ताज के आसपास की कुछ पुरानी गलियों में बचे हैं, वह भी अपने अस्तित्व की आखिरी लड़ाई लड़ते हुए।
तांगे जर्जर हैं, घोड़े बूढ़े हो रहे हैं, और तांगा चालक किसी जमाने की याद की तरह खड़े भर दिखाई देते हैं।विडंबना यह है कि जिन कारणों से तांगों पर रोक लगाई गई, जैसे ‘ट्रैफिक जाम’, वे आज भी वैसी ही हैं, बल्कि कई गुना अधिक। शहर में बढ़ती SUV, टूरिस्ट बसें और बैटरी वाहनों का अनियंत्रित फैलाव ही आज के जाम और प्रदूषण का असली कारण है। इसके विपरीत, तांगा तो आज भी जीरो पॉल्यूशन, जीरो नॉइज़, और 100% पर्यावरण-अनुकूल साधन है। यह मनुष्य, पशु और पर्यावरण के बीच संतुलन का सुंदर उदाहरण है।

फिर भी उम्मीद की किरण बाकी है। हाल ही में केंद्र सरकार ने मैसूर में 2.71 करोड़ रुपये के ‘टोंगा राइड हेरिटेज एक्सपीरियंस जोन’ को मंजूरी दी है। वहाँ तांगों को एक आधुनिक पर्यटन अनुभव के रूप में पुनर्जीवित किया जा रहा है, सुसज्जित तांगा स्टैंड, घोड़ा स्टेबल, निर्धारित रूट, और प्रशिक्षित चालक। इससे न केवल स्थानीय संस्कृति बची है, बल्कि रोजगार और पर्यटन में भी वृद्धि हुई है। सवाल यही है, जब मैसूर अपनी विरासत बचा सकता है, तो ताजमहल का शहर आगरा क्यों नहीं?यही सोच लेकर रिवर कनेक्ट कैंपेन ने आगरा नगर निगम को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपा है। ज्ञापन में आग्रह किया गया है कि: ऐतिहासिक क्षेत्रों में सीमित एवं नियंत्रित तांगा जोन फिर स्थापित किए जाएँ।
तांगा चालकों को प्रशिक्षण, वर्दी और मानक संचालन ढांचा दिया जाए। Heritage Tonga Trail जैसे विशेष पर्यटन मार्ग विकसित हों, ताजमहल, आगरा किला, मेहताब बाग और इतमाद-उद-दौला को जोड़ते हुए। स्थानीय कारीगरों को तांगे के सजावटी निर्माण, मरम्मत और डिजाइन में जोड़कर रोज़गार और सांस्कृतिक सशक्तिकरण बढ़ाया जाए।ताजमहल देखने आने वाला सैलानी आज भी एक प्रामाणिक, ‘ओरिजिनल आगरा’ अनुभव की तलाश करता है और तांगा उससे बेहतर विकल्प कोई नहीं। यह न केवल पर्यटन को नया आयाम दे सकता है, बल्कि शहर की पहचान को भी पुनर्जीवित कर सकता है। बैटरी रिक्शा और कैब सुविधाजनक अवश्य हैं, पर वे वह रोमांटिक धड़कन नहीं दे सकते जो घोड़े की टापों में छुपी होती है।
आगरा सिर्फ संगमरमर की चमक नहीं है, वह उन टन-टन की आवाज़ों का शहर भी है जो पीढ़ियों तक इसकी पहचान रहीं। अगर इस संस्कृति को पुनर्जीवित करने की कोशिश आज नहीं की गई तो यह विरासत हमेशा के लिए खो जाएगी।इसलिए सवाल सिर्फ यह नहीं है कि तांगा बचेगा या नहीं, सवाल यह है—क्या आगरा अपनी आत्मा बचाना चाहता है?
क्या ताजमहल का शहर अपने अतीत, अपनी विरासत और अपने अनोखे आकर्षण को फिर से जीवन देगा?समय आ गया है कि आगरा अपनी खोई हुई धुन को वापस बुलाए, वही घोड़ों की टापों की ताल, जो कभी इस शहर की धड़कन हुआ करती थी, क्योंकि तांगा सिर्फ एक सवारी नहीं, आगरा की जीवित, सांस लेती धड़कन है, और एक तहजीब है।

बृज खंडेलवाल










