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क्या नक्सलवाद की बारूद भरी राह पुलिस की गोलियों से थमी, या विकास की रोशनी से?

आगरा: बुधवार 19 फरवरी 2026

सच शायद इन दोनों के बीच कहीं खड़ा है।सख्त सुरक्षा अभियान चले। खुफिया तंत्र मजबूत हुआ। राज्यों के बीच बेहतर तालमेल बना। जंगलों में सिर्फ बंदूक नहीं, रणनीति भी उतरी।लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती।राजनैतिक संकल्प ने दिशा दी। “विकास” कागज़ से निकलकर ज़मीन पर उतरा। सड़कें पहुँचीं। मोबाइल टॉवर खड़े हुए। राशन, पेंशन, उजाला और रोज़गार की योजनाएँ उन इलाकों तक पहुँचीं, जिन्हें बरसों से “लाल गलियारा” कहा जाता था।नतीजा?नक्सलवाद का नशा उतरने लगा।पिछले कुछ वर्षों में हजारों बंदूकधारियों ने हथियार डाल दिए।

कई बड़े, इनामी लीडर मारे गए। संगठन की कमर टूटी। वैचारिक जज़्बा हकीकत की ज़मीन पर बिखरने लगा।यह सिर्फ पुलिस की जीत नहीं थी।यह सिर्फ विकास की कहानी भी नहीं।यह उस संयुक्त रणनीति का असर था, जिसमें सुरक्षा, संवाद और कल्याणकारी योजनाएँ एक साथ आगे बढ़ीं। बंदूक की धमक के साथ-साथ भरोसे की दस्तक भी सुनाई दी।और जब उम्मीद लौटती है, तो बंदूक अक्सर झुक जाता है।

जो जंगल कभी गोलियों की गूंज से कांपते थे। आज वहीं सड़कों पर बसें चल रही हैं। जहाँ बारूदी सुरंगें बिछती थीं, वहाँ अब मोबाइल टावर खड़े हैं।समय बदल गया है। और उसके साथ बदल गई है हिंसा की सियासत।प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नारा “सबका साथ, सबका विकास” महज़ जुमला नहीं रहा। यह हुकूमत की नई ज़बान बना। योजनाएँ काग़ज़ से निकलकर आख़िरी गांव तक पहुँचीं। बैंक खाते खुले। दलालों की चेन टूटी। सड़कें जंगलों तक आईं। और यहीं से माओवादी असर की ज़मीन दरकने लगी।

नक्सलवाद की कहानी 1967 के नक्सलबाड़ी से शुरू हुई। ज़मीन विवाद भड़का। किसानों ने बगावत की। बंदूक को इंसाफ़ का रास्ता बताया गया। नेताओं ने इसे वर्ग संघर्ष कहा। आदिवासियों को क्रांति का चेहरा बनाया गया।चारु मजूमदार और कानू सान्याल जैसे नाम प्रतीक बने। पर बंदूक की राह लंबी थी। और खून से सनी हुई।1972 में मजूमदार की मौत के बाद आंदोलन बिखरा। कई गुट बने। अंततः 2004 में अलग-अलग धड़े मिलकर Communist Party of India (Maoist) बने। तब तक तथाकथित “रेड कॉरिडोर” फैल चुका था। बिहार। झारखंड। छत्तीसगढ़। ओडिशा। आंध्र प्रदेश। महाराष्ट्र। तेलंगाना। एक लंबी लाल पट्टी।

2010 इसका चरम था। करीब दो हज़ार हिंसक घटनाएँ। एक हज़ार से ज़्यादा मौतें। स्कूल उड़ाए गए। पुलिस पर घात लगाकर हमले हुए। जंगल खामोश नहीं, खौफ़ज़दा थे। कारण भी थे।आदिवासियों की ज़मीन छीनी गई।खनन से विस्थापन हुआ। वन अफसरों की मनमानी चली। सरकारी लापरवाही ने नाराज़गी को हवा दी।माओवादियों ने समानांतर “जन अदालतें” चलाईं। मुखबिर बताकर लोगों को मौत दी गई। ठेकेदारों से लेवी वसूली गई। युवा आकर्षित हुए। बंदूक ग्लैमर बनी। पर धीरे-धीरे क्रांति की चमक उतर गई। विचारधारा पर माफ़ियागीरी हावी हो गई। लेवी का पैसा नेतृत्व की ऐशो-आराम में बहने लगा। अंदरूनी सफ़ाये हुए। शक में अपने ही मारे गए। इधर देश बदल रहा था। समाजवाद से बाज़ार आधारित कल्याण की ओर। राज्य ने रणनीति बदली।2014 में सत्ता परिवर्तन हुआ।

केंद्र में नई सरकार आई। गृह मंत्री Amit Shah ने साफ़ संदेश दिया , “सख़्ती भी, सरोकार भी।”एक तरफ़ सुरक्षा अभियान तेज़ हुए।दूसरी तरफ़ विकास की बारिश शुरू हुई। 2014 में 126 ज़िले प्रभावित थे।2025 तक घटकर 11 रह गए।सबसे गंभीर 36 से घटकर सिर्फ़ 3।2010 में 1,936 घटनाएँ। 2025 में घटकर 141। मौतें 1,005 से गिरकर 87। 2025 में 390 माओवादी मारे गए। 860 ने आत्मसमर्पण किया।करीब 2,000 ने संगठन छोड़ा। फरवरी 2026 तक तस्वीर और साफ़।सिर्फ़ 8 घटनाएँ। 2 नागरिक मौतें। 37 उग्रवादी ढेर। दंतेवाड़ा में 63 कैडर एक साथ आत्मसमर्पण।अब “रेड कॉरिडोर” सिमटकर छत्तीसगढ़ के बस्तर और ओडिशा के कुछ हिस्सों तक रह गया है। पर असली कहानी आँकड़ों से आगे है।12,000 किलोमीटर से अधिक सड़कें जंगलों में पहुँचीं। 8,500 मोबाइल टावर लगे। 300 से ज़्यादा सुरक्षात्मक बंकर बने। बैंक और डाकघर खुले।मनरेगा ने साल में 100 दिन का रोज़गार दिया।

प्रधानमंत्री आवास योजना ने करोड़ों घर बनाए, जिनमें बड़ी संख्या आदिवासी परिवारों की।आयुष्मान भारत ने 50 करोड़ लोगों को स्वास्थ्य बीमा से जोड़ा। एकलव्य स्कूलों ने आदिवासी बच्चों को नई राह दी। युवाओं के लिए आईटीआई और स्किल सेंटर खुले। रोज़गार की उम्मीद बढ़ी। अब सवाल बदला है।युवा स्टेनगन नहीं, स्मार्टफोन चाहता है। वह खाड़ी देशों में नौकरी कर रहा है। वह वोट डाल रहा है। माओवादियों ने चुनाव का बहिष्कार किया। लोकतंत्र को “बुर्जुआ ढोंग” कहा। पर आदिवासी भारी संख्या में मतदान केंद्र पहुँचे।

2023 में छत्तीसगढ़ में सत्ता परिवर्तन हुआ। जिन इलाकों को कभी गढ़ कहा जाता था, वहाँ भी नई राजनीति आई। हिंसा ने अपना ही नुकसान किया। टीकाकरण का बहिष्कार हुआ। बच्चे मरे। पुल उड़ाए गए। गांव कट गए। एक आत्मसमर्पण कर चुके कैडर ने कहा, “हम ज़मीन के लिए लड़े थे। उन्होंने हमें घर, शौचालय और नल दे दिए। नक्सलवाद सैन्य रूप से असफल रहा। राजनीतिक रूप से शून्य। नैतिक रूप से भी सवालों में।

2000 के बाद 10,000 से अधिक नागरिक मारे गए। हिंसा ने सिर्फ़ ज़ख्म दिए। विकास ने विकल्प दिया।1960 के दशक की उपेक्षा ने इसे जन्म दिया था। 21वीं सदी का कल्याणकारी मॉडल इसे दफना रहा है। लक्ष्य है , 31 मार्च 2026 तक नक्सल मुक्त भारत। लाल साया अब धुंधला है। बंदूक की गूंज फीकी है। रोटी और रोज़गार की मांग उठ रही है।और शायद यही असली बदलाव है।

बृज खंडेलवाल

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