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भारत में लोकतंत्र है, कोई भी प्रधानमंत्री बन सकता है….. जो न नूतन है न पुरातन,जो सृष्टि के साथ आया वो है सनातन: शंकराचार्य

आगरा: गुरुवार 15 जनवरी 2026

जयपुर हाउस स्थित माधव भवन के उद्घाटन हेतु पधारे शारदा पीठाधीश्वर जगतगुरु शंकराचार्य स्वामी, राजराजेश्वराश्रम जी महाराज ने जयपुर हाउस स्थित सुमित ढल के निवास पर आयोजित प्रेस वार्ता में पत्रकारों द्वारा पूछे गए प्रश्नों का उत्तर देते हुए कहा कि जो न नूतन है न पुरातन,जो सृष्टि के साथ आया वो है सनातन।

भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाए जाने के सवाल पर कहा कि बनाया उसे जाता है जो हो न। भारत हिन्दू राष्ट्र कब नहीं था। भारत के संविधान में भले ही हिन्दू राष्ट्र न हो, परन्तु सनातन सृष्टि के प्रारम्भ से है। जो लोग भारत को हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात करते हैं उनकी भावना अच्छी है, परन्तु शब्द प्रयोग ठीक नहीं है। संविधान बहुत छोटी चीज है,जो बनती बिगड़ती है।

हिन्दू राष्ट्र बनाने की बात पर राष्ट्र के प्रति प्रेम कम अपने राजनीतिक एजेन्डे और अपनी कुर्सी को बनाए रखने का दृष्टिकोण अधिक है। संविधान सिर्फ व्यवस्था का नाम है जो बनते बिगड़ते रहते हैं। संविधान कोई बहुत बड़ी समस्या नहीं है। जिन्हें चुनकर भेजा है उनकी जिम्मेदारी है संविधान को ठीक करना।

ओबेसी के कथन कि बुर्का पहनकर भी महिला प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठ सकती है के सवाल पर कहा कि लोकतंत्र है,गधा भी प्रधानमंत्री बन सकता है। जब ज्यादा पशु इकट्ठे हो जाएंगे तो उनका प्रतिनिधि बन जाएगा। मनुष्य भी एक पशु ही है।

किसी भी संकट में हिन्दू एकजुट क्यों होता,प्रश्न के सवाल पर कहा कि हमारा सनातन धर्म का रक्त शुद्ध नहीं रहा। विशाक्त हो चुका है। जब शरीर का रक्त विशाक्त हो जाता है तो फोड़े फुंसी,कई प्रकार की बीमारी उत्पन्न हो जाती हैं। आज सनातन के विशाक्त रक्त को शोधन की आवश्यकता है। जो सनातन धर्मावलम्बी हैं, वो तो गर्व से कहें कि हम सनातनी हैं। कोई जैन, कोई बौद्ध कोई सिक्ख बना है। जब तक रक्त शोधन नहीं होगा तब तक बंगला देश की तरह समस्त विश्व में चलता रहेगा।

समस्त विश्व की समस्याओं का समाधन सनातन का रक्त शोधन से ही होगा। जो सनातम धर्म के रक्त में दोष आ गए हैं उसका शोधन होना जरूरी है। सनातन रक्त का शोधन सत्ता प्राप्ति से नहीं होगा। सत्ता का चाल, चरित्र चेहरा एक होता है,जो कुर्सी पर बैठता है वह वोट गिनता है।

सनातन धर्म के संस्कारित, संगठिक होने से रक्त शोधन होगा। सनातन धर्म को सत्ता की जरूरत नहीं है। सत्ता धर्म के सामने झुकती है। सत्ता में दोष ही दोष हैं। सनातन को संस्कारित और संगठित करने का काम करने के लिए संघ की तरह अनेक संगठन काम कर रहे हैं। उनकी क्रियाशीलता बढ़नी चाहिए।

हम दीन हीन न बने सनातन के स्वाभीमान को लेकर आगे बढ़ें। सत्ता सनातन के समाने झुकती है। परन्तु लगता है भारत कृषि प्रधान से आज कुर्सी प्रधान देश हो गया। जो सत्ता का लोभ और ललक आज अल्पसंख्यकों से अधिक बहुसंख्यकों को है। वो अल्पसंख्यक होते हुए भी अपने संगठन के काम में लगे हैं।

बहुसंख्यकों को सत्ता चाहिए, जिसके लिए तुष्टीकरण, फिर वोटों को जोड़ना। शंकाराचार्य के गमन पर उनका आरती कर पुष्प वर्षा कर वेदोच्चारण के साथ स्वागत किया गया। इस अवसर पर मुख्य रूप से सुमित ढल, संदीप ढल, जलदीप कपूर, विजय सामा, विजय गोयल आदि उपस्थित थे।

विशेष संवाददाता

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