बचपन में जब अखबार घर पर आता था तो अखबार खोलते ही सब से पहले फिल्म वाला पेज ढूंढ के देखते थे कि कौन सी फिल्म किस थियेटर में चल रही है, नई फिल्म कब और किस थियेटर में लगने वाली है… कितने हफ़्ते से कौन सी फिल्म चल रही है…

बस हमारे पास अखबार का इतना ही महत्व होता था..क्योंकि तब शहर के हर थियेटर में कौन सी फिल्म लगी है कौन सितारे है और कौन कौन से हिट गाने उस फिल्म में यह ज्ञान अखबार से ही पता चलता था, या सड़कों के चौराहों पर चिपके रंगबिरंगे पोस्टरों से।

यह 1960 के दशक का ज़माना था तब फिल्मों का रूमानी दौर था, गीत संगीत पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता था, अब धार्मिक और स्टंट फिल्में कम बनने लगी थी.. यह फिल्मी दुनिया का सुनहरा दौर माना जाता है, इस दौर में हल्की फुलकी बम्बईया फार्मूले पर बनती फिल्म अच्छे अंत पर खत्म होती थी…

जबकि 1950 के दौर में संजीदा और धार्मिक फिल्में खूब बनती और पसंद की जाती थी साथ साथ पेरलल में स्टंट तलवार बाज़ी, जादुई फिल्में भी चलती थीं…….1975 में शोले, और अमिताभ जी की एंग्री मेन इमेज के बाद धीरे धीरे फिल्मों का मिजाज़ बदला और हिंसा से लिप्त फिल्मों का बोल बाला शुरू हो कर आज गर्त में डूब गया, और संगीत की तो मधुरता कर्ण प्रियता तो समाप्त ही हो गयी है अधिकांश बैकग्राउंड में चीखता म्यूजिक होता है, लिप सिंगिंग बागों में फिल्माए गीत तो समाप्त से ही हैं।

आजकल सोशल मीडिया पर धर्मेन्द्र जी की मृत्यु के बाद, उनकी 1960 के दशक की उनकी पुरानी फिल्मे देख और गीत सुनकर यह सब कुछ याद आ गया।

एड. आनंद शर्मा










