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आस्था व भक्ति का संचार कर गई नरसी भात की कथा: “नानी बाई रो मायरो कथा” का आरबीएस कॉलेज सभागार में हुआ शुभारंभ, श्री गौरदास जी महाराज ने सुनाई कथा

आगरा: मंगलवार 23 दिसम्बर 2025

श्री हरि सत्संग समिति द्वारा देश के 40 करोड़ वनवासियों के उत्थान को समर्पित शांति पुरस्कार प्राप्त संस्था द्वारा आरबीएस डिग्री कॉलेज के भव्य सभागार में नानी बाई रो मायरो : कथा नरसी भात का आयोजन किया गया। जिसमें व्यास पीठ से श्री गौर दास जी महाराज ने आध्यात्मिक और धार्मिक प्रसंगों को सुनाया। बीच-बीच में भक्ति संगीत की स्वर लहरियों से सभागार झंकृत होता रहा। शुरुआत भक्ति संगीत की स्वर लहरियों के साथ हुई।

कथा का उद्घाटन दीप प्रज्ज्वलित करके मुख्य अतिथि उत्तर प्रदेश लघु उद्योग निगम के चेयरमैन राकेश गर्ग और विशिष्ट अतिथि आरबीएस डिग्री कॉलेज के प्रधानाचार्य प्रो.विजय श्रीवास्तव सहित श्री हरि सत्संग समिति और महिला समिति के पदाधिकारियों द्वारा किया गया। वहीं श्री गौरदास जी महाराज का माला पहनाकर स्वागत किया गया।

संयोजक संजय गोयल के मुताबिक माल्यार्पण करने वालों में अध्यक्ष शांतिस्वरूप गोयल सहित अनिल अग्रवाल, संजय बंसल, विवेक अग्रवाल, उमेश बंसल, राधा किशन गुप्ता, रमेश मित्तल, संजय मित्तल, प्रदीप गोयल, विजय गोयल, अरुण मित्तल, कल्याण प्रसाद मंगल, विष्णु दयाल बंसल, महिला समिति की अध्यक्ष अंशु अग्रवाल, मीनू त्यागी, मधु गोयल, सोनिया गर्ग आदि शामिल थे।

कथा का समापन आरती के साथ किया गया। व्यास पीठ से श्री गौरदास जी महाराज जी ने कथा से पूर्व निताई गौर हरि बोल के जयकारों के बीच भक्ति संगीत की स्वर लहरियों को प्रवाहित किया-“नरसी के सांवरिया श्याम, सांवरिया के नरसी…!” भारत पुण्य भूमि है। यह विभिन्न धर्मों की उदगम स्थली है। गौरदास जी महाराज ने नरसी भगत की भक्ति की व्याख्या करते हुए कहा कि भगवान खुद उनके यहां भात पहनाने पहुंचे थे। उनके विषय में भक्त माल में भी कहा गया है-जगत विदित नरसी भगत…! उन्होंने कहा कि प्रभु की लीला तो नित्य है, जो कि किसी काल के बंधन में नहीं बंधी हुई है।

पिछले जन्मों के कर्मों के बंधन के कारण वर्तमान है, और वर्तमान के कर्म बंधन से भविष्य तय होता है। यह शरीर तो बिल्कुल धर्मशाला समान है, एक दिन तो इसे खाली करना पड़ेगा सबको, इसलिए जब तक शरीर है, गोविंद को याद कर लीजिए।श्री गौरदास जी महाराज ने बताया नरसिंह राम मेहता जी का जन्म गुजरात में हुआ था, उस समय गुजरात में बहुत अधर्मी थे और कुछ सनातन धर्म को मानते भी थे, लेकिन इसका गलत उपयोग करते थे।

ऐसे समय में प्रभु कृपा से नरसी जी ने पूरे गुजरात को इतना भक्तिमय बना दिया कि आज भी वहा भक्ति की ध्वजा खूब लहरा रही है। *नरसी भगत को भाभी ठोकर न देती तो ठाकुर न मिलते*महाराज जी ने बयाया नरसी जन्म से गूंगे-बहरे थे जब छोटे थे तब माता-पिता को भगवान की प्राप्ति हो गई। भक्तों के साथ ऐसे परीक्षा होती है। इनकी दादी ने इन्हें पाला। उन्होंने बड़े पोते की शादी कर दी और सोचा बहू आकर हमको और नरसी को पालेगी। पर वह तो शुरू से ही नरसी से जलती थी। बहुत कष्ट देती थी। जब नरसी बड़े हुए उन्होंने घर के नौकर हटा दिए, और इनसे घर का सारा काम करवाती। गायों के लिए घास बहुत दूर से मंगवाती।

एक दिन वह भागते-भागते आए, बोले भाभी पानी दे दो। वह गुस्सा होकर बोली मैं तेरी नौकरानी हूं। खाने-पीने के समय घर आ जाता है। काम कुछ करता नहीं। घर से निकल जा, जब वह नहीं गए तो भगवान की कसम दे दी। भगवान का नाम सुन वह घर छोड़कर चले गए। इंद्रेश्वर महादेव मंदिर के बाहर जाकर सात दिन भूखे प्यासे रहे और भोले को पुकारते रहे। सात दिन बाद पार्वती जी ने भोले बाबा से कहा, बालक की रक्षा करो, तभी शिवलिंग फट गया और भोले बाबा बाहर आए। नरसी से वरदान मांगने को कहा नरसी ने कहा, आपको जो सबसे प्यारी चीज लगती हो, वह दे दो।

भोले बाबा ने कहा, मुझे तो राधा-कृष्ण प्रिय लगते हैं, चलो मैं तुम्हें वृंदावन ले चलता हूं। तब इन्हें लेकर रास में आए और मशाल जलाने की सेवा दे चले गए। रास में नरसी इतने मगन हो गए कि पूरा हाथ और बाजू जलने लगी, तभी ललिता सखी पास आई जैसे उनको छुआ नरसी की बाजू ठीक हो गई। उन्होंने बताया श्री कृष्ण के रास में भोले बाबा त्रिलोचना सखी स्वरूप में थे, जहां उनकी मशाल दिखाने की सेवा थी। तभी भजन के स्वर गूंजे-“सखी नाचे राधा गोपाल श्री वृंदावन में, मोहन के मुख पे बाजे मुरलिया, श्री जी की पायल रसाल श्री वृंदावन में, मेरे नाचे राधा गोपाल श्री वृंदावन में…! उन्होंने बताया नरसी जी को अगर भाभी ने ठोकर न मारी होती, तो ठाकुर न मिले होते। इस बीच भजन सुनाया-दुखों से ठोकर न खाई होती, तो प्रभु की मधुर याद आई न होती, …!

श्री हरि सत्संग समिति द्वारा चलाए जा रहे इस प्रकल्प से नक्सलाइट इलाकों में वनवासी परिवारों के भटके युवाओं को सही मार्ग पर लाकर देश-समाज के रचनात्मक कार्यों से जोड़ने का काम भी किया जा रहा है।संयोजक संजय गोयल ने बताया संस्था की शुरुआत वर्ष 1989 में हुई, जबकि वर्ष 1996 से विभिन्न कथाओं का आयोजन किया जा रहा है। इनके जरिए अर्जित धन को वनवासियों के कल्याण पर व्यव किया जा रहा है। देश में संस्था की कई शाखायें हैं। वनवासियों को भारतीय संस्कृति-संस्कारों के रंग में रंगने के काम में अतुलनीय सहयोग दिया जा रहा है। इसी क्रम में आवासीय प्रशिक्षण केंद्र का शिलान्यास किया जा चुका है। जिसमें प्रशिक्षण कार्यशालाओं में वनवासी बहिनों को भगवान श्री राम और श्री कृष्ण की कथा में प्रशिक्षित किया जायेगा। भवन का हाथरस मार्ग पर निर्माण प्रगति पर है। प्रशिक्षण में वनवासियों को हिंदू धर्म के मर्म को समझाने का कार्य किया जायेगा, ताकि वनवासी परिवारों को भारतीय संस्कृति-संस्कारों से परिचित कराकर जड़ों से जोड़ते चलें।

न्यूज़ डेस्क

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