दाल बाटी चूरमा एक ऐसा पकवान है जो केवल सावन के महीने में ही बनाया और खाया जाता है। राजस्थानी दाल बाटी चूरमा पत्तल पर परोसने का पारंपरिक तरीका बेहद खास है। पत्तियों से बनी पत्तल और दोने भोजन में एक अलग सौंधी महक और प्राकृतिक अनुभव जोड़ देते हैं। इसमें गरमा-गरम बाटी को घी में डुबोकर, साथ में मसालेदार पंचमेल दाल और मीठा चूरमा परोसा जाता है।
एक समय था जब बगीचियों में इसका आयोजन होता था, लोग प्राकृतिक वातावरण में सपरिवार इसका आनंद लिया करते थे। अब तो वो आनन्द केवल यादों में सिमट के रह गया है।
आज से पचास बरस पहले आगरा में कई बगीचियां आबाद थीं, जिनमें प्रमुख थीं हलवाई की बगीची, बंबई वाली बगीची, पांडेजी की बगीची, बलकेश्वर मंदिर, कैलाश मंदिर और कीठम जैसे स्थानों पर दाल बाटी चूरमा का आयोजन होता था।
पत्तल पर दाल बाटी, चूरमा, सूखे आलू, चटनी, सकोरे में रायता और खीर, कुल्हड़ में जलजीरा…. क्या स्वाद हुआ करता था। शहर के तमाम संगठन इनका आयोजन करते थे, लोग परिवार सहित खूब आनंद लिया करते थे।
रविवार के दिन इन बगीचीयों की पहले से बुकिंग हो जाया करती थी। सुबह से शाम तक इन बगीचीयों पर भीड़ रहती थी। एक तरफ हलवाई अपने कारीगरों के साथ दाल बाटी चूरमा बनाया करते थे, और लोग आराम से बैठ कर खाने का इंतज़ार किया करते थे। आपस में हंसी ठिठोली, खेल कूद, गीत संगीत का आनंद लिया करते थे।
लगता है आपसी प्रेम, सौहार्द और सदभावना का वो दौर अब समाप्त हो गया है। पुरानी परंपराएं अब खत्म होती जा रही हैं। आनन्द की परिभाषा ही बदल चुकी है। अब तो हलवाई की दुकान पर खड़े होकर ही दाल बाटी चूरमा का स्वाद लेते लोग नज़र आते हैं।
विशेष संवाददाता










