इलाहाबाद उच्च न्यायालय — महत्वपूर्ण निर्णय
वाद: श्याम पाल बनाम बी.एस. एंटरप्राइजेज | 2026:AHC:70799
प्रयागराज: सोमवार 6 अप्रैल 2026
इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने दिनांक: 2 अप्रैल 2026 को अपने एक ऐतिहासिक निर्णय में स्पष्ट किया है कि उत्तर प्रदेश शहरी परिसर किरायेदारी विनियमन अधिनियम, 2021 के अंतर्गत यदि मकान मालिक अपने परिसर की आवश्यकता बताता है, तो किरायेदार को वह मकान या दुकान खाली करना ही होगा।
न्यायमूर्ति डॉ. योगेन्द्र कुमार श्रीवास्तव की एकल पीठ ने यह महत्वपूर्ण निर्णय श्याम पाल बनाम बी.एस. एंटरप्राइजेज के प्रकरण में सुनाया। न्यायालय ने यह भी स्पष्ट किया कि अब मकान मालिक को पुराने कानून की भाँति ‘बोनाफाइड आवश्यकता’ या ‘तुलनात्मक कठिनाई’ सिद्ध करने की आवश्यकता नहीं है।
प्रकरण की पृष्ठभूमिकानपुर नगर के गांधी नगर, ‘P’ रोड स्थित 106/376 में एक दुकान के किरायेदार श्याम पाल मात्र पाँच सौ रुपये प्रतिमाह किराए पर काबिज थे। मकान मालिक बी.एस. एंटरप्राइजेज ने विरासत में यह संपत्ति प्राप्त की और नए अधिनियम, 2021 की धारा 21(2)(a), (b) तथा (m) के अंतर्गत बेदखली का आवेदन दाखिल किया। मकान मालिक का कहना था कि उसके पास लगभग 150 वर्ग गज का गोदाम और 90 वर्ग गज की फर्नीचर कार्यशाला है। दुकान का कब्जा मिलने पर वह कार्यशाला नीचे और आवास ऊपर रखना चाहता है।किरायेदार की दलीलें और उनका खंडनयाची श्याम पाल ने तर्क दिया कि मकान मालिक की आवश्यकता वास्तविक नहीं है, उसके पास पर्याप्त वैकल्पिक आवास उपलब्ध है और यह दुकान उनकी आजीविका का एकमात्र साधन है। उन्होंने यह भी कहा कि नोटिस की तामील सही नहीं हुई और किराए को रु.500/- से बढ़ाकर रु.1,00,000/- करने का प्रयास कानूनन अमान्य है। किन्तु न्यायालय ने इन सभी दलीलों को नामंजूर कर दिया और कहा कि नए कानून के अंतर्गत ये तर्क अब प्रासंगिक ही नहीं रहे।
निचली अदालतों में क्या हुआ
किराया प्राधिकरण ने 19 जून 2025 को मकान मालिक का आवेदन स्वीकार करते हुए बेदखली का आदेश पारित किया। न्यायालय ने यह भी दर्ज किया कि किराया रु.500/- प्रतिमाह था और किराए में कोई बकाया नहीं था। इसके बाद श्याम पाल ने किराया न्यायाधिकरण में अपील की, जिसे 30 जनवरी 2026 को खारिज कर दिया गया। इस पर श्याम पाल ने इलाहाबाद उच्च न्यायालय में अनुच्छेद 227 के अंतर्गत याचिका दाखिल की।
नए कानून और पुराने कानून में मूलभूत अंतर
न्यायालय ने 1972 के पुराने कानून और 2021 के नए कानून की तुलना करते हुए बताया कि पुराने अधिनियम में मकान मालिक को दो बातें सिद्ध करनी होती थीं — पहली, कि उसे मकान की वास्तविक और ‘बोनाफाइड’ आवश्यकता है, और दूसरी, कि किरायेदार की तुलना में उसकी कठिनाई अधिक है। नए अधिनियम, 2021 की धारा 21(2)(m) में ये दोनों शर्तें जानबूझकर हटाई गई हैं। यह परिवर्तन कोई भूल नहीं, बल्कि विधायिका का सोचा-समझा निर्णय है। अब मकान मालिक को केवल यह बताना पर्याप्त है कि परिसर उसके स्वयं के उपयोग के लिए चाहिए।
‘आवश्यकता’ शब्द का विधिक अर्थ
न्यायालय ने इंग्लैंड के न्यायालय की एक पुरानी मिसाल Ireland v. Taylor [1949] का हवाला देते हुए स्पष्ट किया कि ‘आवश्यकता’ (requires) शब्द का अर्थ यह है कि मकान मालिक की परिसर पर कब्जा लेने की मंशा वास्तविक और ईमानदार होनी चाहिए। जब तक मकान मालिक की मंशा सच्ची है और केवल बहाना नहीं, वह अपनी आवश्यकता का स्वयं निर्णायक है। न्यायालय को उसकी आवश्यकता की तर्कसंगतता पर बहस करने का अधिकार नहीं है।
न्यायालय कानून में शब्द नहीं जोड़ सकता
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि जब विधायिका ने किसी शब्द या शर्त को जानबूझकर कानून से हटाया हो, तो न्यायालय उसे वापस नहीं ला सकता। सर्वोच्च न्यायालय के निर्णयों का हवाला देते हुए कहा गया कि ‘बोनाफाइड’, ‘वास्तविक’ या ‘तत्काल आवश्यकता’ जैसे शब्द धारा 21(2)(m) में पढ़ना न्यायिक विधि-निर्माण होगा, जो अनुमत नहीं है।
किरायेदार पर साक्ष्य का भार
एक बार मकान मालिक अपनी आवश्यकता दर्शा दे, तो किरायेदार का दायित्व है कि वह ठोस साक्ष्य से उसे खंडित करे। केवल बातों से या अस्पष्ट दलीलों से इनकार करना पर्याप्त नहीं है। वर्तमान मामले में श्याम पाल कोई विश्वसनीय साक्ष्य प्रस्तुत नहीं कर सके, इसलिए मकान मालिक की आवश्यकता सिद्ध मानी गई।
उच्च न्यायालय का अंतिम निर्णय
माननीय उच्च न्यायालय ने किराया प्राधिकरण और किराया न्यायाधिकरण के आदेशों को सही ठहराते हुए श्याम पाल की याचिका खारिज कर दी। हालाँकि न्यायालय ने मानवीय दृष्टिकोण अपनाते हुए श्याम पाल को 2 दिसम्बर 2026 तक परिसर खाली करने का समय दिया। शर्तें यह रखी गईं कि दो सप्ताह के भीतर किराया प्राधिकरण के समक्ष शपथ-पत्र दाखिल करना होगा, प्रत्येक माह की सातवीं तारीख तक दो हजार रुपये उपयोग शुल्क जमा करना होगा, और किसी भी शर्त के उल्लंघन पर यह सुरक्षा स्वतः समाप्त हो जाएगी।
यह निर्णय क्यों महत्वपूर्ण हैयह निर्णय उत्तर प्रदेश के सभी मकान मालिकों और किरायेदारों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यह एक ‘AFR’ अर्थात रिपोर्टिंग योग्य निर्णय है जो प्रदेश के सभी किराया प्राधिकरणों और न्यायाधिकरणों पर बाध्यकारी है। यह निर्णय स्पष्ट संदेश देता है कि नया कानून मकान मालिकों को अपनी संपत्ति वापस लेने का सरल और प्रभावी मार्ग प्रदान करता है।
किरायेदारों को क्या समझना चाहिए
नए कानून के लागू होने के बाद किरायेदारों को यह समझ लेना चाहिए कि अब केवल यह कहना पर्याप्त नहीं होगा कि मकान मालिक के पास और संपत्ति है या उनकी जरूरत उतनी जरूरी नहीं है। यदि मकान मालिक अपनी आवश्यकता स्पष्ट रूप से दर्शाता है और किरायेदार उसे ठोस साक्ष्य से नहीं काट सकता, तो बेदखली अवश्यंभावी है। किरायेदारों को समय रहते विधिक परामर्श लेना चाहिए।
के सी जैन, वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय










